Saturday, July 5, 2014

कलकतिया बाबू

शरतचन्द्र के उपन्यास श्रीकांत से प्रस्तुत अंश पराग पत्रिका में कलकतिया बाबू के नाम  से प्रकाशित हुआ था।  मैंने भी उसी शीर्षक का प्रयोग किया है , आशा करता हूँ कि आप सभी को पसन्द आयेगा। 

कलकतिया बाबू


वह कड़ाके की शीत-काल की संध्याख थी। पिछले दिन पानी का एक अच्छा झला पड़ चुका था, इसलिए जाड़ा सूई की तरह शरीर में चुभता था। आकाश में पूरा चन्द्रमा उगा था। चारों तरफ चाँदनी मानो तैर रही थी। एकाएक इन्द्र आ टपका; बोला, ''थियेटर देखने चलेगा?'' थियेटर के नाम से मैं एकबारगी उछल पड़ा। इन्द्र बोला, ''तो फिर कपड़े पहिनकर शीघ्र हमारे घर आ जा।'' पाँच मिनट में एक रैपर लेकर बाहर निकल पड़ा। उस स्थान को ट्रेन से जाना होता था। सोचा, घर से गाड़ी करके स्टेशन पर जाना होगा- इसलिए इतनी जल्दी है।
इन्द्र बोला, ''ऐसा नहीं, हम लोग नाव पर चलेंगे। मैं निरुत्साहित हो गया, क्योंकि, गंगा में नाव को उस ओर खेकर ले जाना पड़ेगा, और इसलिए बहुत देर हो जाने की सम्भावना थी। शायद समय पर पहुँचा न जा सके। इन्द्र बोला, ''हवा तेज है, देर न होगी। हमारे नवीन भइया कलकत्ते से आए हैं, वे गंगा से ही जाना चाहते हैं।''
खैर, दाँड लेकर, पाल तानकर ठीक तरह से हम लोग नाव में बैठ गये- बहुत देर करके नवीन भइया घाट पर पहुँचे। चन्द्रमा के आलोक में उन्हें देखकर मैं तो डर गया। कलकत्ते के भयंकर बाबू! रेशम के मोजे, चमचमाते पम्प शू, ऊपर से नीचे तक ओवरकोट में लिपटे हुए, गले में गुलूबन्द, हाथ में दस्ताने, सिर पर टोपी- शीत के विरुद्ध उनकी सावधानी का अन्त नहीं था। हमारी उस साधाकी डोंगी को उन्होंने अत्यन्त 'रद्दी' कहकर अपना कठोर मत जाहिर कर दिया; और इन्द्र के कन्धों पर भार देकर तथा मेरा हाथ पकड़कर, बड़ी मुश्किल से, बड़ी सावधानी से, वे नाव के बीच में जाकर सुशोभित हो गये।
''तेरा नाम क्या है रे?''
डरते-डरते मैंने कहा, ''श्रीकान्त।''
उन्होंने आक्षेप के साथ मुँह बनाकर कहा, ''श्रीकान्त- सिर्फ 'कान्त' ही काफी है। जा हुक्का तो भर ला। अरे इन्द्र, हुक्का-चिलम कहाँ है? इस छोकरे को दे, तमाखू भर दे!''
अरे बाप रे! कोई अपने नौकर को भी इस तरह की विकट भाव-भंगी से आदेश नहीं देता। इन्द्र अप्रतिभ होकर बोला, ''श्रीकान्त, तू आकर कुछ देर डाँड़ पकड़ रख। मैं हुक्का भरे देता हूँ।''
उसका जवाब न देकर मैं खुद ही हुक्का भरने लगा। क्योंकि वे इन्द्र के मौसेरे भाई थे, कलकत्ते के रहने वाले थे और हाल ही में उन्होंने एल.ए. पास किया था। परन्तु मन मेरा बिगड़ उठा। तमाखू भरकर हुक्का हाथ में देते ही उन्होंने प्रसन्न मुख से पीते-पीते पूछा, ''तू कहाँ रहता है रे कान्त? तेरे शरीर पर वह काला-काला सा क्या है रे? रैपर है? आह! रैपर की क्या ही शोभा है। इसके तेल की बास से तो भूत भी भाग जावें! छोकरे-फैलाकर बिछा तो दे यहाँ उसे, बैठें उस पर।''
''मैं देता हूँ, नवीन भइया, मुझे ठण्ड नहीं लगती। यह लो'' कहकर इन्द्र ने अपने शरीर पर की अलवान चट से उतारकर फेंक दी। वह उसे मजे से बिछाकर बैठ गया और आराम से तमाखू पीने लगा।
शीत ऋतु की गंगा अधिक चौड़ी नहीं थी- आधा घण्टे में ही डोंगी उस किनारे से जा भिड़ी। साथ ही साथ हवा बन्द हो गयी।
इन्द्र व्याकुल हो बोला, ''नूतन भइया, यह तो बड़ी मुश्किल हुई- हवा बन्द हो गयी। अब तो पाल चलेगा नहीं।''
नूतन भइया बोले, ''इस छोकरे के हाथ में दे न, डाँड़ खींचे।'' कलकत्तावासी नूतन भइया की जानकारी पर कुछ मलिन हँसी हँसकर इन्द्र बोला, ''डाँड़! कोई नहीं ले जा सकता। नूतन भइया, इस रेत को ठेलकर जाना किसी के किये भी सम्भव नहीं। हमें लौटना पड़ेगा।''
प्रस्ताव सुनकर नूतन भइया मुहूर्त भर के लिए अग्निशर्मा हो उठे, ''तो फिर ले क्यों आया हतभागे? जैसे हो, तुझे वहाँ तक पहुँचाना ही होगा। मुझे थियेटर में हारमोनियम बजाना ही होगा- उनका विशेष आग्रह है।'' इन्द्र बोला, ''उनके पास बजाने वाले आदमी हैं नूतन भइया, तुम्हारे न जाने से वे अटके न रहेंगे।''
''अटके न रहेंगे? इस गँवार देश के छोकरे बजावेंगे हारमोनियम! चल, जैसे बने वैसे ले चल।'' इतना कहकर उन्होंने जिस तरह का मुँह बनाया, उससे मेरा सारा शरीर जल उठा। उसका हारमोनियम बजाना भी हमने बाद में सुना, किन्तु वह कैसा था सो बताने की जरूरत नहीं।
इन्द्र का संकट अनुभव करके मैं धीरे से बोला, ''इन्द्र, क्या रस्सी से खींचकर ले चलने से काम न चलेगा?'' बात पूरी होते न होते मैं चौंक उठा। वे इस तरह दाँत किटकिटा उठे, कि उनका वह मुँह आज भी मुझे याद आ जाता है। बोले, ''तो फिर जा न, खींचता क्यों नहीं? जानवर की तरह बैठा क्यों है?''
इसके बाद एक दफे इन्द्र और एक दफे मैं रस्सी खींचते हुए आगे बढ़ने लगे। कहीं ऊँचे किनारे के ऊपर से, कहीं नीचे उतर कर, और बीच-बीच में उस बरफ सरीखे ठण्डे जल की धारा में घुसकर, हमें अत्यन्त कष्ट से नाव ले चलना पड़ा। और फिर बीच-बीच में बाबू के हुक्के को भरने के लिए भी नाव को रोकना पड़ा। परन्तु बाबू वैसे ही जमकर बैठे रहे- जरा भी सहायता उन्होंने नहीं की। इन्द्र ने एक बार उनसे 'कर्ण' पकड़ने को कहा तो जवाब दिया, कि ''मैं दस्ताने खोलकर ऐसी ठण्ड में निमोनिया बुलाने को तैयार नहीं हूँ।'' इन्द्र ने कहना चाहा, ''उन्हें खोले बगैर ही...''
''हाँ, कीमती दस्तानों को मिट्टी कर डालूँ, यही न! ले, जा जो करना हो कर।''
वास्तव में मैंने ऐसे स्वार्थ पर असज्जन व्यक्ति जीवन में थोड़े ही देखे हैं। उनके एक वाहियात शौक को चरितार्थ करने के लिए हम लोगों को- जो उनसे उम्र में बहुत छोटे थे- इतना सब क्लेश सहते हुए अपनी ऑंखों देखकर वे जरा भी विचलित न हुए। कहीं से जरा-सी ठण्ड लगाकर उन्हें बीमार न कर दें, एक छींटा जल पड़ जाने से कहीं उनका कीमती ओवरकोट खराब न हो जाय, हिलने-चलने में किसी तरह का व्याघात न हो- इसी भय से वे जड़ होकर बैठे रहे और चिल्ला-चिल्लाकर हुक्मों की झड़ी लगाते रहे।
और भी एक आफत आ गयी- गंगा की रुचिकर हवा में बाबू साहब की भूख भड़क उठी और, देखते-ही-देखते, अविश्राम बक-झक की चोटों से, और भी भीषण हो उठी। इधर चलते-चलते रात के दस बज गये हैं-थियेटर पहुँचते-पहुँचते रात के दो बज जाँयगे, यह सुनकर बाबू साहब प्राय: पागल हो उठे। रात के जब ग्यारह बजे तब, कलकत्ते के बाबू बेकाबू होकर बोले, ''हाँ रे इन्द्र, पास में कहीं हिन्दुस्तानियों की कोई बस्ती-अस्ती है कि नहीं? चिउड़ा-इउड़ा कुछ मिलेगा?''
इन्द्र बोला, ''सामने ही एक खूब बड़ी बस्ती है नूतन भइया, सब चीजें मिलती हैं।''
''तो फिर चला चल- अरे छोकरे, जरा खींच न जोर से- क्या खाने को नहीं पाता? इन्द्र, बोल न तेरे इस साथी से, थोड़ा और जोर करके खींच ले चले?''
इन्द्र ने अथवा मैंने किसी ने इसका जवाब नहीं दिया। जिस तरह चल रहे थे उसी तरह चलते हुए हम थोड़ी देर में एक गाँव के पास जा पहुँचे। यहाँ पर किनारा ढालू और विस्तृत होता हुआ जल में मिल गया था। नाव को बलपूर्वक धक्का देकर, उथले पानी में करके, हम दोनों ने एक आराम की साँस ली।
बाबू साहब बोले, ''हाथ-पैर कुछ सीधे करना होगा। उतरना चाहता हूँ।'' अतएव इन्द्र ने उन्हें कन्धों पर उठाकर नीचे उतार दिया। वे ज्योत्स्ना के आलोक में गंगा की शुभ्र रेती पर चहलकदमी करने लगे।
हम दोनों जनें उनकी क्षुधा-शान्ति के उद्देश्य से गाँव के भीतर घुसे। यद्यपि हम लोग जानते थे कि इतनी रात को इस दरिद्र खेड़े में आहार-संग्रह करना सहज काम नहीं है तथापि चेष्टा किये बगैर भी निस्तार नहीं था। इस पर, अकेले रहने की भी उनकी इच्छा नहीं थी। इस इच्छा के प्रकाशित होते ही इन्द्र उसी दम आह्नान करके बोला, ''नवीन भइया, अकेले तुम्हें डर लगेगा- हमारे साथ थोड़ा घूमना भी हो जायेगा। यहाँ कोई चोर-ओर नहीं है, नाव कोई नहीं ले जायेगा। चले न चलो।''
नवीन भइया अपने मुँह को कुछ विकृत करके बोले, ''डर! हम लोग दर्जी पाड़े के लड़के हैं- यमराज से भी नहीं डरते- यह जानते हो? फिर भी नीच लोगों की डर्टी (गन्दी) बस्ती में हम नहीं जाते। सालों के शरीर की बू यदि नाक में चली जाय तो हमारी तबियत खराब हो जाए।'' वास्तव में उनका मनोगत अभिप्राय यह था कि मैं उनके पहरे पर नियुक्तर होकर उनका हुक्का भरता रहूँ।
किन्तु उनके व्यवहार से मन ही मन में इतना नाराज हो गया था कि इन्द्र के इशारा करने पर भी मैं किसी तरह, इस आदमी के संसर्ग में, अकेले रहने को राजी नहीं हुआ। इन्द्र के साथ ही चल दिया।
दर्जीपाड़े के बाबू साहब ने हाथ-ताली देते हुए गाना शुरू कर दिया। हम लोगों को बहुत दूर तक नाक के स्वर की उनकी जनानी तान सुनाई देती रही। इन्द्र खुद भी मन ही मन अपने भाई के व्यवहार से अतिशय लज्जित और क्षुब्ध हो गया था। धीरे से बोला, ''ये कलकत्ते के आदमी ठहरे, हमारी तरह हवा-पानी सहन नहीं कर सकते- समझे न श्रीकान्त?''
मैं बोला, ''हूँ।''
तब इन्द्र उनकी असाधारण विद्या बुद्धि का परिचय, शायद श्रद्धा आकर्षित करने के लिए देते हुए चलने लगा। बातचीत में यह भी उसने कहा कि वे थोड़े ही दिनों में बी.ए. पास करके डिप्टी हो जाँयगे। जो हो, अब इतने दिनों के बाद भी इस समय वे कहाँ के डिप्टी हैं अथवा उन्हें वह पद प्राप्त हुआ या नहीं, मुझे नहीं मालूम। परन्तु, जान पड़ता है कि वे डिप्टी अवश्य हो गये होंगे, नहीं तो बीच-बीच में बंगाली डिप्टियों की इतनी सुख्याति कैसे सुन पड़ती? उस समय उनका प्रथम यौवन था। सुनते हैं, जीवन के इस काल में हृदय की प्रशस्सता, संवेदना की व्यापकता, जितनी बढ़ती है उतनी और किसी समय नहीं। लेकिन, इन कुछ घण्टों के संसर्ग में ही जो नमूना उन्होंने दिखाया इतने समय के अन्तर के बाद भी वह भुलाया नहीं जा सका। फिर भी, भाग्य से ऐसे नमूने कभी-कभी दिखाई पड़ जाते हैं- नहीं तो, बहुत पहले ही यह संसार बाकायदा पुलिस थाने के रूप में परिणत हो जाता। पर रहने दो अब इस बात को।
परन्तु, पाठकों को यह खबर देना आवश्यक है कि भगवान भी उन पर क्रुद्ध हो गये थे। इस तरफ के राह-घाट, दुकान-हाट, सब इन्द्र के जाने हुए थे। वह जाकर एक मोदी की दुकान पर उपस्थित हो गया। परन्तु दुकान बन्द थी और दुकानदार ठण्ड के भय से दरवाजे-खिड़कियाँ बन्द करके गहरी निद्रा में मग्न था। नींद की वह गहराई कितनी अथाह होती है, सो उन लोगों को लिखकर नहीं बताई जा सकती, जिन्हें खुद इसका अनुभव न हो। ये लोग न तो अम्ल-रोगी निष्कर्मा जमींदार हैं और न बहुत भार से दबे हुए, कन्या के दहेज की फिक्र से ग्रस्त बंगाली गृहस्थ। इसलिए सोना जानते हैं। दिन भर घोर परिश्रम करने के उपरान्त, रात को ज्यों ही उन्होंने चारपाई ग्रहण की कि फिर, घर में आग लगाए बगैर, सिर्फ चिल्लाकर या दरवाजा खटखटाकर उन्हें जगा दूँगा- ऐसी प्रतिज्ञा यदि स्वयं सत्यवादी अर्जुन भी, जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा के बदले कर बैठते तो, यह बात कसम खाकर कही जा सकती है कि उन्हें भी मिथ्या प्रतिज्ञा के पाप से दग्ध होकर मर जाना पड़ता।
हम दोनों जनें बाहर खड़े होकर तीव्र कण्ठ से चीत्कार करके तथा जितने भी कूट-कौशल मनुष्य के दिमाग में आ सकते हैं, उन सबको एक-एक करके आजमा करके, आधा घण्टे बाद खाली हाथ लौट आए। परन्तु घाट पर आकर देखा तो वह जन-शून्य है। चाँदनी में जहाँ तक नजर दौड़ती थी वहाँ तक कोई भी नहीं दिखता। 'दर्जीपाड़े' का कहीं कोई निशान भी नहीं। नाव जैसी थी वैसी ही पड़ी हुई है- फिर बाबू साहब गये कहाँ? हम दोनों प्राणपण से चीत्कार कर उठे-'नवीन भइया' किन्तु कहीं कोई नहीं। हम लोगों की व्याकुल पुकार, बाईं और दाहिनी बाजू के खूब ऊँचे कगारों से टकराकर, अस्पष्ट होती हुई, बार-बार लौटने लगी। आस-पास के उस प्रदेश में, शीतकाल में, बीच बीच में बाघों के आने की बात भी सुनी जाती थी। गृहस्थ किसान इन दलबद्ध बाघों की विपत्ति से व्यस्त रहते थे। सहसा इन्द्र इसी बात को कह बैठा, ''कहीं बाघ तो नहीं उठा ले गया रे!'' भय के मारे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। यह क्या कहते हो? इसके पहले उनके निरतिशय अभद्र व्यवहार से मैं नाराज तो सचमुच ही हो उठा था परन्तु, इतना बड़ा अभिशाप तो मैंने उन्हीं नहीं दिया था!
सहसा दोनों जनों की नजर पड़ी कि कुछ दूर बालू के ऊपर कोई वस्तु चाँदनी में चमचमा रही है। पास जाकर देखा तो उन्हीं के बहुमूल्य पम्प-शू की एक फर्द है? इन्द्र भीगी बालू पर लेट गया- ''हाय श्रीकान्त! साथ में मेरी मौसी भी तो आई हैं। अब मैं घर लौटकर न जाऊँगा!'' तब धीरे-धीरे सब बातें स्पष्ट होने लगीं। जिस समय हम लोग मोदी की दुकान पर जाकर उसे जगाने का व्यर्थ प्रयास कर रहे थे, उसी समय, इस तरफ कुत्तों का झुण्ड इकट्ठा होकर आर्त्त चीत्कार करके इस दुर्घटना की खबर हमारे कर्णगोचर करने के लिए व्यर्थ मेहनत उठा रहा था, यह बात अब जल की तरह हमारी ऑंखों के आगे स्पष्ट हो गयी। अब भी हमें दूर पर कुत्तों का भूँकना सुन पड़ता था। अतएव जरा भी संशय नहीं रहा कि बाघ उन्हें खींच ले जाकर जिस जगह भोजन कर रहे हैं, वहीं आस-पास खड़े हो ये कुत्ते भी अब भौंक रहेहैं।
अकस्मात् इन्द्र सीधा होकर खड़ा हो गया और बोला, ''मैं वहाँ जाऊँगा।'' मैंने डरकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, ''पागल हो गये हो भइया!'' इन्द्र ने इसका कुछ जवाब नहीं दिया। नाव पर जाकर उसने कन्धों पर लग्गी रख ली, एक बड़ी लम्बी छुरी खीसे में से निकालकर बाएँ हाथ में ले ली और कहा, ''तू यहीं रह श्रीकान्त, मैं न आऊँ तो लौटकर मेरे घर खबर दे देना- मैं चलता हूँ।''
उसका मुँह बिल्कुतल सफेद पड़ गया था, किन्तु दोनों ऑंखें जल रही थीं। मैं उसे अच्छी तरह चीन्हता था। यह उसकी निरर्थक, खाली उछल-कूद नहीं थी कि हाथ पकड़ कर दो-चार भय की बातें कहने से ही, मिथ्या दम्भ मिथ्या में मिल जायेगा। मैं निश्चय से जानता था कि किसी तरह भी वह रोका नहीं जा सकता- वह जरूर जायेगा। भय से जो चिर अपरिचित हो, उसे किस तरह और क्या कहकर रोका जाता? जब वह बिल्कुसल जाने ही लगा तो मैं भी न ठहर न सका; मैं भी, जो कुछ मिला, हाथ में लेकर उसके पीछे-पीछे चल दिया। इस बार इन्द्र ने मुख फेरकर मेरा एक हाथ पकड़ लिया और कहा, ''तू पागल हो गया है श्रीकान्त! तेरा क्या दोष है? तू क्यों जायेगा?''
उसका कण्ठ-स्वर सुनकर मेरी ऑंखों में एक मुहूर्त में ही जल भर आया। किसी तरह उसे छिपाकर बोला, ''तुम्हारा ही भला, क्या दोष है इन्द्र? तुम ही क्यों जाते हो?''
जवाब में इन्द्र ने मेरे हाथ से बाँस छीनकर नाव में फेंक दिया और कहा, ''मेरा भी कुछ दोष नहीं है भाई, मैं भी नवीन भइया को लाना नहीं चाहता था। परन्तु, अब अकेले लौटा भी नहीं जा सकता, मुझे तो जाना होगा।''
परन्तु मुझे भी तो जाना चाहिए। क्योंकि, पहले ही एक दफे कह चुका हूँ कि मैं स्वयं भी बिल्कुतल डरपोक न था। अतएव बाँस को फिर उठाकर मैं खड़ा हो गया और वाद-विवाद किये बगैर ही हम दोनों आगे चल दिए। इन्द्र बोला, ''बालू पर दौड़ा नहीं जा सकता-खबरदार, दौड़ने की कोशिश न करना। नहीं तो, पानी में जा गिरेगा।''
सामने ही एक बालू का टीला था। उसे पार करते ही दीख पड़ा, बहुत दूर पर पानी के किनारे छह-सात कुत्ते खड़े भौंक रहे हैं। जहाँ तक नजर गयी वहाँ तक थोड़े से कुत्तों को छोड़कर, बाघ तो क्या, कोई शृंगाल भी नहीं दिखाई दिया। सावधानी से कुछ देर और अग्रसर होते ही जान पड़ा कि कोई एक काली-सी वस्तु पानी में पड़ी है और वे उसका पहरा दे रहे हैं। इन्द्र चिल्ला उठा, ''नूतन भइया!''
नूतन भइया गले तक पानी में खड़े हुए अस्पष्ट स्वर से रो पड़े, ''यहाँ हूँ मैं!''
हम दोनों प्राणपण से दौड़ पड़े, कुत्ते हटकर खड़े हो गये, और इन्द्र झप से कूद कर गले तक डूबे हुए मूर्च्छित प्राय: अपने दर्जीपाड़े के मौसेरे भाई को खींचकर किनारे पर उठा लाया। उस समय भी उनके एक पैर में बहुमूल्य पम्प-शू, शरीर पर ओवरकोट, हाथ में दस्ताने, गले में गुलूबन्द और सिर पर टोपी थी। भागने के कारण फूलकर वे ढोल हो गये थे! हमारे जाने पर उन्होंने हाथ-ताली देकर जो बढ़िया तान छेड़ दी थी, बहुत सम्भव है, उसी संगीत की तान से आकृष्ट होकर, गाँव के कुत्ते दल बाँधकर वहाँ आ उपस्थित हुए थे! और उस अभूतपूर्व गीत और आदरपूर्ण पोशाक की छटा से विभ्रान्त होकर इस महामान्य व्यक्ति के पीछे पड़ गये थे। पीछा छुड़ाने के लिए इतनी दूर भागने पर भी आत्मरक्षा का और कोई उपाय न खोज सकने के कारण अन्त में झप से पानी में कूद पड़े; और इस दुर्दान्त शीत की रात में, तुषार-शीतल जल में आधे घण्टे गले तक डूबे रहकर अपने पूर्वकृत् पापों का प्रायश्चित करते रहे। किन्तु, प्रायश्चित के संकट को दूर करके उन्हें फिर से चंगा करने में भी हमें कम मेहनत नहीं उठानी पड़ी। परन्तु सबसे बढ़कर अचरज की बात यह हुई की बाबू साहब ने सूखे मैं पैर रखते ही पहली बात यही पूछी, ''हमारा एक पम्प-शू कहाँ गया?''
''वह वहाँ पड़ा हुआ है।'' यह सुनते ही वे सारे दु:ख-क्लेश भूलकर उसे शीघ्र ही उठा लेने के लिए सीधे खड़े हो गये। इसके बाद, कोट के लिए गुलूबन्द के लिए, मोजों के लिए, दस्तानों के लिए, पारी-पारी से एक-एक के लिए शोक प्रकाशित करने लगे और उस रात को जब तक हम लोग लौटकर अपने घाट पर नहीं पहुँच गये, तब तक यही कहकर हमारा तिरस्कार करते रहे कि क्यों हमने मूर्खों की तरह उनके शरीर से उन सब चीजों को जल्दी-जल्दी उतार डाला था। न उतारा होता तो इस तरह धूल लगकर वे मिट्टी न हो जाते। हम दोनों असभ्य लोगों में रहने वाले ग्रामीण किसान हैं, हम लोगों ने इन चीजों को पहले कभी ऑंख से देखा तक नहीं होगा- यह सब वे बराबर कहते रहे। जिस देह पर, इसके पहले, एक छींटा भी जल गिरने से वे व्याकुल हो उठते थे, कपड़े-लत्तों के शोक में वे उस देह को भी भूल गये। उपलक्ष्य वस्तु असल वस्तु से भी किस तरह कई गुनी अधिक होकर उसे पार कर जाती है, यह बात, यदि इन जैसे लोगों के संसर्ग में न आया जाए, तो इस तरह प्रत्यक्ष नहीं हो सकती।
रात को दो बजे बाद हमारी डोंगी घाट पर आ लगी। मेरे जिस रैपर की विकट बूसे कलकत्ते के बाबू साहब, इसके पहले, बेहोश हुए जाते थे, उसी को अपने शरीर पर डालकर- उसी की अविश्रान्त निन्दा करते हुए तथा पैर पोंछने में भी घृणा होती है, यह बार-बार सुनाते हुए भी- और इन्द्र की अलवान ओढ़कर, उस यात्रा में आत्म रक्षा करते हुए घर गये। कुछ भी हो, हम लोंगों पर दया करके जो वे व्याघ्र-कवलित हुए बगैर सशरीर वापिस लौट आए, उनके उसी अनुग्रह के आनन्द से हम परिपूर्ण हो रहे थे। इतने उपद्रव-अत्याचार को हँसते हुए सहन करके और आज नाव पर चढ़ने के शौक की परिसमाप्ति करके, उस दुर्जय शीत की रात में, केवल एक धोती-भर का सहारा लिये हुए, काँपते-काँपते, हम लोग घर में लौट आए।


Friday, July 4, 2014

शरतचन्द्र के उपन्यास श्रीकांत से एक मज़ेदार अंश


शरतचन्द्र के उपन्यास 

श्रीकांत 

से एक मज़ेदार  अंश 


वह दिन मुझे खूब याद है। सारे दिन लगातार गिरते रहने पर भी मेघ बन्द नहीं हुआ था। सावन का आकाश घने बादलों से घिरा हुआ था। शाम होते-न-होते चारों ओर अन्धकार छा गया। जल्दी-जल्दी खाकर, हम सभी भाई रोज की तरह बाहर बैठकखाने में बिछे हुए बिस्तर पर रेड़ी के तेल का दीपक जलाकर, पुस्तक खोलकर, बैठ गये थे। बाहर के बरामदे में एक तरफ फूफाजी केन्वास की खाट पर लेटे हुए अपनी सांध्यी तन्द्रा का उपभोग कर रहे थे और दूसरी ओर बूढ़े रामकमल भट्टाचार्य अफीम खाकर अन्धकार में आँखें मींचे हुए हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। डयोढ़ी पर हिंदुस्तानी दरबान का 'तुलसीदास स्वर' सुन पड़ रहा था और भीतर हम तीनों भाई मँझले भइया की कड़ी देख-रेख में चुपचाप विद्याभ्यास कर रहे थे। छोटे भइया, जतीन और मैं तीसरी और चौथी कक्षा में पढ़ते थे और गम्भीर स्वभाव के मँझले भइया दो दफे एण्ट्रेस फेल होकर तीसरी दफे की तैयारी कर रहे थे। उनके प्रचण्ड शासन में किसी को एक मिनट भी नष्ट करने का साहस न होता था। हम लोगों का पढ़ने का समय था। 7.30 से 9 बजे तक। उस समय बातचीत करके हम उनकी 'पास होने' की पढ़ाई में विघ्न न डाल सकें, इसके लिए वे रोज कैंची से काट-काटकर कागज के 25-30 टिकट जैसे टुकड़े रख छोड़ते। उनमें से किसी में लिखा होता, 'बाहर जाना है', किसी में 'थूकना है', किसी में 'नाक साफ करना है', किसी में 'पानी पीना है' आदि। जतीन भइया ने नाक साफ करने का एक टिकट मँझले भइया के सामने पेश किया। मँझले भइया ने उस पर अपने हाथ से लिख दिया, '8 बजकर 33 मिनट से लेकर 8 बजकर 33.30 मिनट तक।' अर्थात् इतने समय के लिए नाक साफ करने जा सकते हैं। छुट्टी पाकर जतीन भइया टिकट हाथ में लेकर गये ही थे कि छोटे भइया ने थूकने जाने का टिकट पेश कर दिया। मँझले भइया ने उस पर 'नहीं' लिख दिया। इस पर दो मिनट तक छोटे भइया मुँह फुलाए बैठे रहे और उसके बाद उन्होंने पानी पीने की अर्जी दाखिल कर दी। इस बार वह मंजूर हो गयी। मँझले भइया ने इसके लिए लिख दिया, ''हाँ, 8 बजकर 41 मिनट से लेकर 8 बजकर 47 मिनट तक।'' परवाना लेकर छोटे भइया हँसते हुए ज्यों ही बाहर गये त्यों ही जतीन भइया ने लौटकर हाथ का टिकट वापस दे दिया। मँझले भइया ने घड़ी देखकर और समय मिलाकर एक रजिस्टर बाहर निकाला और उसमें वह टिकट गोंद से चिपका दिया। यह सब सामान उनकी हाथ की पहुँच के भीतर ही रक्खा रहता था। सप्ताह सप्ताह होने पर इन सब टिकटों को सामने रखकर कैफियत तलब की जाती थी कि क्यों अमुक दिन तुमने इजाजत से अधिक समय लगा दिया। 
इस प्रकार मँझले भइया की अत्यन्त सतर्कता और श्रृंखलाबद्धता से- हमारा और उनका खुद का-किसी का जरा-सा भी समय नष्ट न होने पाता था। इस तरह प्रतिदिन, डेढ़ घण्टा, खूब पढ़ लेने के उपरान्त, जब हम लोग रात के 9 बजे घर में सोने को आते थे तब निश्चय ही माता सरस्वती हमें घर की चौखट तक पहुँचा जाती थीं; और दूसरे दिन स्कूल की कक्षा से जो सब सम्मान सौभाग्य प्राप्त करके हम घर लौटते थे वह तो आप समझ ही गये होंगे। परन्तु मँझले भइया का दुर्भाग्य कि उनके बेवकूफ परीक्षक उन्हें कभी न चीह्न सके! वे निज की तथा पराई शिक्षा-दीक्षा के प्रति इतना प्रबल अनुराग तथा समय के मूल्य के सम्बन्ध में अपने उत्तरदायित्व का इतना सूक्ष्म खयाल रखते थे फिर भी, वे उन्हें बराबर फेल ही करते गये। इसे ही कहते हैं अदृष्ट का अन्धा न्याय-विचार। खैर, जाने दो-अब उसके लिए दुखी होने से क्या लाभ? 
उस रात्रि को भी घर के बाहर वही घना अन्धकार, बरामदे में तन्द्राभिभूत वे दोनों बुङ्ढे और भीतर दीपक के मन्द प्रकाश के सम्मुख गम्भीर अध्यघयन में लगे हुए हम चार प्राणी थे। 
छोटे भइया के लौट आते ही प्यास के मारे मेरी छाती एकबारगी फटने लगी। इसीलिए टिकट पेश करके मैं हुक्म की राह देखने लगा। मँझले भइया उसी टिकटों वाले रजिस्टर के ऊपर झुककर परीक्षा करने लगे कि मेरा पानी पीने के लिए जाना नियम-संगत है या नहीं- अर्थात् कल परसों किस परिमाण में पानी पिया था। 
अकस्मात् मेरे ठीक पीछे से एक 'हुम्' शब्द और साथ ही साथ छोटे भइया और जतीन भइया का आर्तकण्ठ से निकला हुआ, ''अरे बाप रे! मार डाला रे' का गगनभेदी चीत्कार सुन पड़ा। उन्हें किसने मार डाला, सिर घुमाकर यह देखने के पहले ही, मँझले भइया ने सिर उठाकर विकट शब्द किया और बिजली की तेजी से सामने पैर फैला दिए, जिससे दीवट उलट गया। तब उस अन्धकार में 'दक्ष-यज्ञ' मच गया। मँझले भइया को थी मिर्गी की बीमारी, इसलिऐ वे 'ओं-ओं' करके दीवट उलटाकर जो चित्त गिरे सो फिर न उठे। 
ठेलठाल करके मैं बाहर निकला तो देखा कि फूफाजी अपने दोनों लड़कों को बगल में दबाए हुए, उनसे भी अधिक तीव्र स्वर में चिल्लाकर छप्पर फाड़े डाल रहे हैं। ऐसा लगता था मानो उन तीनों बाप-बेटों में इस बात की होड़ लगी हुई है कि कौन कितना गला फाड़ सकता है। 
इसी अवसर पर एक चोर जी छोड़कर भागा जा रहा था और डयोढ़ी के सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया था। फूफाजी प्रचण्ड चीत्कार करके हुक्म दे रहे थे, ''और मारो, साले को, मार डालो।'' इत्यादि। 
दम भर में रोशनी हो गयी, नौकर-चाकरों और पास-पड़ोसियों से आँगन खचाखच भर गया। दरबानों ने चोर को मारते-मारते अधमरा कर दिया और प्रकाश के सम्मुख खींच लाकर, धक्का देकर गिरा दिया। पर चोर का मुँह देखकर घर-भर के लोगों का मुँह सूख गया-अरे, ये तो भट्टाचार्य महाशय हैं! 
तब कोई तो जल ले आया, कोई पंखे से हवा करने लगा, और कोई उनकी आँखों और मुँह पर हाथ फेरने लगा। उधर घर के भीतर मँझले भइया के साथ भी यही हो रहा था। 
पंखे की हवा और जल के छींटे खाकर रामकमल होश में आकर लगे फफक-फफक कर रोने। सभी लोग पूछने लगे, ''आप इस तरह भागे क्यों जा रहे थे?'' भट्टाचार्य महाशय रोते-रोते बोले, ''बाबा, बाघ नहीं, वह एक तगड़ा भालू था- छलाँग मारकर बैठकखाने में से बाहर आ गया।'' 
छोटे भइया और जतीन भइया बारम्बार कहने लगे, ''भालू नहीं बाबा, एक भेड़िया था, पूँछ समेटे पायन्दाज के ऊपर बैठा गुर्रा रहा था।'' 
मँझले भइया, होश में आते ही अधमिची आँखों से दीर्घ निश्वास छोड़ते हुए संक्षेप में बोले, ''दी रॉयल बंगाल टाइगर।'' 
परन्तु वह है कहाँ? चाहे मँझले भइया का 'दी रॉयल बंगाल' हो, चाहे रामकमल का 'तगड़ा भालू' हो, परन्तु वह यहाँ आया ही किस तरह और चला ही कहाँ गया? जब इतने लोगों ने उसे देखा है तब वह होगा तो कुछ न कुछ अवश्य ही। 
तब किसी ने विश्वास किया और किसी ने नहीं किया। किन्तु सभी भय-चकित नेत्रों से लालटेन लेकर चारों तरफ खोजने लगे। 
अकस्मात् पहलवान किशोरसिंह 'वह बैठा है' कहकर एक छलाँग में बरामदे में ऊपर चढ़ गया। उसके बाद वहाँ भी ठेला-ठेली मच गयी। उतने सब लोग बरामदे पर एक साथ चढ़ना चाहते थे, किसी से भी क्षण-भर की देर न सही जाती थी। आँगन के एक तरफ अनार का दरख्त था। मालूम पड़ा कि उसी की घनी डालियों में एक बड़ा जानवर बैठा है। वह बाघ के समान ही मालूम होता था। पलक मारते न मारते सारा बरामदा खाली हो गया और बैठकखाना खचाखच भर गया। बरामदे में एक भी आदमी न रहा। घर की उस भीड़ में से फूफाजी का उत्तेजित कण्ठ स्वर सुन पड़ने लगा, ''बरछी लाओ-बन्दूक लाओ।'' हमारे मकान के पास के मकान में गगन बाबू के पास एक मुंगेरी बन्दूक थी। उनका लक्ष्य उसी अस्त्र पर था। 
'लाओ' तो ठीक, किन्तु लाए कौन? अनार का झाड़ था दरवाजे के ही निकट और फिर उस पर बैठा था भेड़िया। हिंदुस्तानी सिटपिटाए तक नहीं और जो लोग तमाशा देखने आए थे वे भी सनाका खींचकर रह गये। 
ऐसी विपत्ति के समय न जाने कहाँ से इन्द्र आकर उपस्थित हो गया। शायद वह सामने के रास्ते से कहीं जा रहा था और शोरगुल सुनकर अन्दर घुस आया था। पल-भर में सौ कण्ठ एक साथ चीत्कार कर उठे, ''ओ रे, बाघ है बाघ! भाग जा रे लड़के, भाग जा!'' 
पहले तो वह हड़बड़ाकर भीतर दौड़ आया किन्तु पलभर बाद ही, सब हाल सुनकर, निर्भय हो, आँगन में उतर लालटेन उठाकर देखने लगा। 
दुमंजिले की खिड़कियों में से औरतें साँस रोककर इस साहसी लड़के की ओर देख-देखकर 'दुर्गा' नाम जपने लगीं। नीचे भीड़ में खड़े हुए हिंदुस्तानी सिपाही उसे हिम्मत बँधाने लगे और आभास देने लगे कि एकाध हथियार मिलने पर वे भी वहाँ आने को तैयार हैं! 
अच्छी तरह देखकर इन्द्र ने कहा, ''द्वारिका बाबू, यह तो बाघ नहीं मालूम होता।'' उसकी बात समाप्त होते न होते वह 'रॉयल बंगाल टाइगर' दोनों हाथ जोड़कर मनुष्य के ही स्वर में रो पड़ा और बोला, ''नहीं, बाबूजी, नहीं, मैं बाघ-भालू नहीं, श्रीनाथ बहुरूपिया हूँ।'' इन्द्र ठठाकर हँस पड़ा। भट्टाचार्य महाशय खड़ाऊँ हाथ में लिये सबसे आगे दौड़ पड़े- 
''हरामजादे, तुझे डराने के लिए और कोई जगह नहीं मिली?'' फूफाजी ने महाक्रोध से हुक्म दिया, ''साले को कान पकड़कर लाओ।'' 
किशोरी सिंह ने उसे सबसे पहले देखा था, इसलिए उसका दावा सबसे प्रबल था। वह गया और उसके कान पकड़कर घसीटता हुआ ले आया। भट्टाचार्य महाशय उसकी पीठ पर जोर-जोर से खड़ाऊँ मारने लगे और गुस्से के मारे दनादन हिंदी बोलने लगे- 
''इसी हरामजादे बदजात के कारण मेरी हड्डी-पसली चूर हो गयी है। साले पछहियों ने घूँसे मार-मारकर कचूमर निकाल दिया।'' 
श्रीनाथ का मकान बारासत में था। वह हर साल इसी समय एक बार रोजगार करने आता था। कल भी वह इस घर में नारद बनकर गाना सुना गया था। वह कभी भट्टाचार्य महाशय के और कभी फूफाजी के पैर पकड़ने लगा। बोला, ''लड़कों ने इतना अधिक भयभीत होकर, और दीवट लुढ़काकर, ऐसा भीषण काण्ड मचा दिया कि मैं स्वयं भी मारे डर के उस वृक्ष की आड़ में जाकर छिप गया। सोचता था कि कुछ शान्ति होने पर, बाहर आकर, अपना स्वाँग दिखाकर जाऊँगा। किन्तु मामला उत्तरोत्तर ऐसा होता गया कि मेरी फिर हिम्मत ही नहीं हुई।'' 
श्रीनाथ आरजू-मिन्नत करने लगा; किन्तु फूफाजी का क्रोध कम हुआ ही नहीं। बुआजी स्वयं ऊपर से बोलीं, ''तुम्हारे भाग्य भले थे जो सचमुच का बाघ-भालू नहीं निकला, नहीं, तो जैसे बहादुर तुम और तुम्हारे दरबान हैं- छोड़ दो बेचारे को, और दूर कर दो डयोढ़ी के इन पछहियाँ दरबानों को। एक जरा से लड़के में जो साहस है उतना घर-भर के सब आदमियों में मिलकर भी नहीं है।'' फूफाजी ने कोई बात ही न सुनी; वरन् उन्होंने बुआजी के इस अभियोग पर आँखें घुमाकर ऐसा भाव धारण किया कि मानो इच्छा करते ही वे इन सब बातों का काफी और माकूल जवाब दे सकते हैं, परन्तु चूँकि औरतों की बातों का उत्तर देने की कोशिश करना भी पुरुष जाति के लिए अपमानकारक है इसलिए, और भी गरम होकर हुक्म दिया, ''इसकी पूँछ काट डालो।'' तब उसकी रंगीन कपड़े से लिपटी हुई घास की बनी लम्बी पूँछ काट डाली गयी, और उसे भगा दिया गया। बुआजी ऊपर से गुस्से में बोलीं, ''पूँछ को सँभालकर रख छोड़ो, किसी समय काम आएगी!'' 


पंडित सुदर्शन जी की कहानी "हार की जीत" आपने कभी ना कभी अपनी हिंदी की पाठ्यपुस्तक में पढ़ी ही होगी । मैंने इस कहानी की सॉफ्ट कॉपी एक अन्य साइट से आभार सहित ली है। उसी साइट से मुझे ये जानकारी हुई कि "हार की जीत" पंडित जी की पहली कहानी है और १९२० में सरस्वती नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।
हार की जीत 
सुदर्शन 

माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे ‘सुल्तान’ कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रूपया, माल, असबाब, ज़मीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मन्दिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। “मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा”, उन्हें ऐसी भ्रान्ति सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, “ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।” जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।
खड़गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुल्तान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने पूछा, “खडगसिंह, क्या हाल है?”
खडगसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “आपकी दया है।”
“कहो, इधर कैसे आ गए?”
“सुलतान की चाह खींच लाई।”
“विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।”
“मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।”
“उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!”
“कहते हैं देखने में भी बहुत सुँदर है।”
“क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।”
“बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।”
बाबा भारती और खड़गसिंह अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड़गसिंह ने देखा आश्चर्य से। उसने सैंकड़ो घोड़े देखे थे, परन्तु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुजरा था। सोचने लगा, भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड़गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात् उसके हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की-सी अधीरता से बोला, “परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?”
दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर गए। घोड़ा वायु-वेग से उडने लगा। उसकी चाल को देखकर खड़गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था और आदमी भी। जाते-जाते उसने कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।”
बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रति क्षण खड़गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाईं मिथ्या समझने लगे। संध्या का समय था। बाबा भारती सुल्तान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे। सहसा एक ओर से आवाज़ आई, “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।”
आवाज़ में करूणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, “क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?”
अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामावाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।”
“वहाँ तुम्हारा कौन है?”
“दुगार्दत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।”
बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे। सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड़गसिंह था।बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, “ज़रा ठहर जाओ।”
खड़गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।”
“परंतु एक बात सुनते जाओ।” खड़गसिंह ठहर गया।
बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड़गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।”
“बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल घोड़ा न दूँगा।”
“अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।”
खड़गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड़गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, “बाबाजी इसमें आपको क्या डर है?”
सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, “लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।” यह कहते-कहते उन्होंने सुल्तान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही नहीं रहा हो।
बाबा भारती चले गए। परंतु उनके शब्द खड़गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था। कहते थे, “इसके बिना मैं रह न सकूँगा।” इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख्याल था कि कहीं लोग दीन-दुखियों पर विश्वास करना न छोड़ दे। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है।
रात्रि के अंधकार में खड़गसिंह बाबा भारती के मंदिर पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड़गसिंह सुल्तान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक खुला पड़ा था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। खड़गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे। रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात्, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँव को मन-मन भर का भारी बना दिया। वे वहीं रूक गए। घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया। अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो। बार-बार उसकी पीठपर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते। फिर वे संतोष से बोले, “अब कोई दीन-दुखियों से मुँह न मोड़ेगा।”

Saturday, June 21, 2014

Amar Chitra Katha

अमर चित्रकथा 



अमर चित्रकथा की शरुआत 1967 में अनंत पई द्वारा की गयी।  अमर चित्रकथा भारत की पौराणिक एवं ऎतिहासिक कथाओंपर आधारित थीं , बाद में महापुरुषों , कवियों , वैज्ञानिकों की जीवनी और लोक गाथाओं  पर भी चित्रकथा लिखनी शुरू की गयी।  

अमर चित्र कथा के माध्यम से बच्चे अपने इतिहास और पुराण का  ज्ञान  प्राप्त करने के साथ साथ महान व्यक्तित्वों से  भी परिचित होते आये हैं।  
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अनंत पई 

१९२९ - २०११ 


  

  


  

  

   

Thursday, June 19, 2014

Indian Comic Strips



भारत में चित्रकथा 


चित्रकथाओं को बाल साहित्य का ही हिस्सा माना जाता रहा है क्योंकि चित्रों  के माध्यम से बच्चों को कहानी के पात्रों और वस्तुस्थिति के बारे में समझाना आसान हो जाता है। भारत में चित्रकथाओं की  शुरुआत विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कॉमिक स्ट्रिप  के रूप में हुई।  भारतीय चित्रकथाओ  से पहले विदेशी चित्रकथाओं के हिंदी अनुवाद ही उपलब्ध थे जो शायद भारतीय चित्रकथाओ के लिए प्रेरणास्रोत बने।

 





  

 


      

     

    



       
 
 























Saturday, June 7, 2014



मुंशी प्रेमचंद  का बाल साहित्य में योगदान

 

आज बाल साहित्य कुछ गिनी चुनी पत्रिकाओ तक ही  सिमट कर रह गया है, जो शायद नए लेखको और साहित्यकारो के बचकाने प्रयास भर ही है।  साहित्य जगत के मझे हुए खिलाड़ियों को बाल साहित्य लिखने में कोई रूचि  नहीं है क्योकि बाल साहित्य लेखको को प्रोत्साहित करने के लिए ना कोई बड़ा पुरस्कार ही दिया जाता है और न किसी प्रकार की गाढ़ी कमाई ही है।  आज नए लेखक या कवि जो  साहित्य जगत में अभी अभी आये हैं वो अपनी कलम की धार तेज करने के उददेश्य से बाल रचनाये लिख रहे हैं जिसकी वजह से बाल साहित्य का स्तर दिन पे दिन गिरता जा रहा है। उन रचनाओं में वो विषय नहीं होते जो बच्चों और किशोरों के मन तक पहुंच पाये , ये रचनाये मनोरंजन मात्र के लिए ही होती हैं। 
आज बच्चो में भी पढ़ने की रूचि कम  हुई है , पढने से मेरा तात्पर्य अपनी पाठयपुस्तक (TEXT BOOK) के अतिरिक्त पुस्तके पढ़ने से है।  आज के इस दौर में प्रत्येक माता पिता अपने बच्चो को भविष्य बनाने के लिए डॉक्टर और इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं , कुछ अपवादों को छोड़ कर साहित्य और कला के क्षेत्र में उनकी मजबूरी ही ले आती है।  क्योकि आज माँ बाप के साथ साथ बच्चे भी साहित्य पढ़ने को समय के बर्बादी ही मानते हैं।  आज के बच्चो किशोरों और युवाओं में नैतिक मूल्य नज़र नहीं आते क्योकि उन्हें साहित्य और कला को किनारे कर के पैसा कमाने की ओर प्रेरित किया गया है। अच्छे संस्कार , आदते और संस्कृति की समझ मनुष्य को बचपन  में ही सिखाये  जा सकते  है और इसका दायित्व माँ बाप और शिक्षको पर होता है।  माँ बाप का दायित्व ज्यादा है क्योकि माँ बाप ही अपनी संतान को दुनिया में लाते हैं तो वो बच्चा बड़ा हो कर समाज पर बोझ या समाज के प्रति  गैर जिम्मेवार ना हो जाए  इसका ध्यान माँ बाप को ही रखना चाहिए।  आज समाचारो में आये दिन ऐसी अप्रिय घटनाये सुनने को मिलती हैं जो आज के युवाओ में देश और समाज के प्रति गैर जिम्मेदाराना रवैया दर्शाती है और ये पिछले २५ सालो में साहित्य और कला के प्रति बच्चो किशोरों और युवाओ की उदासीनता का परिणाम है।  माँ बाप और शिक्षको ने बच्चो को नंबर पाने और पैसा कमाने पर बल दिया पर नैतिक मूल्य और संस्कारो को आत्मसात करना नहीं बता पाये।  बाल साहित्य जो बच्चो और किशोरों के चरित्र  निर्माण में सहायक हो सकता था उसे नयी पीढ़ी के माँ बाप और  शिक्षको के साथ साथ सरकार ने  भी दरकिनार किया।  

साहित्य कोई पढ़ना नहीं चाहता और ना ही लिखना चाहता है।  हाँ सही पढ़ा  आपने की कोई लिखना नहीं चाहता।  जो कुछ भी लिखा जाता है चाहे वो बड़ो के लिए लिखा जाता हो या बच्चो के लिए वो जबरदस्ती ही लिखा जाता है।  बड़ो के लिए लिखे जाने वाले साहित्य में कुंठित मन की अभिव्यक्ति ही होती है और जो अंतरंग सम्बन्धो और अश्लीलता को समेटे होती  है या लेखन ऐसी व्यक्तिगत समस्या पर  केंद्रित होता है जिससे किसी  और का सरोकार ही ना हो।  कुछ ऐसे भी साहित्यकार हैं जो बस पुरस्कार पाने के उद्देश्य से ही लिखते है।  

बाल साहित्य लिखने के लिए दुनिया को बच्चो और  किशोरों की नज़र से देखने की  आवश्यकता होती है।  बड़ा बन कर बच्चो के लिए नहीं लिखा जा सकता।   रुसी साहित्य कार  लियो तोलस्तोय  ने जितना और जैसा बच्चो  के लिए लिखा है   उसी से मेल खाता साहित्य भारत में प्रेमचंद ने लिखा। 

प्रेमचंद ने बच्चो के लिए जो कुछ लिखा है उसका अनुसरण  ही आज के साहित्य कार करते आ रहे हैं।  प्रेमचंद की लिखी हुई प्रसिद्ध बाल कहानियो में ईदगाह , दो बैलो की कथा ,  सच्चाई का उपहार, बड़े भाई साहब , गुल्ली - डंडा, कजाकी इत्यादि को गिना  जा सकता है। 



Monday, June 2, 2014

 प्रख्यात बाल साहित्य कार श्री हरी कृष्ण देवसरे और श्रीप्रसाद जी का निधन बाल साहित्य जगत के लिए बहुत बड़ी क्षति है।  डॉ. देवसरे का एक लम्बी बीमारी का बाद १४ नवंबर २०१३ को निधन हो गया,  बाल साहित्य जगत के स्तम्भ का बाल दिवस के दिन ही अंत हो जाना अपने आप में एक विडम्बना है।  ऐसे शख्स का जिसने अपना जीवन बाल साहित्य जगत को अपने निरंतर प्रयासों से सवारने में लगा दिया और बच्चो के लिया लेखन को  समर्पित रहा  उनका बाल दिवस के दिन ही हमेशा के लिए चले जाना प्रकृति के द्वारा किया गया चुटीला व्यंग  ही है।  

श्री हरी कृष्ण देवसरे जी से मेरा परिचय पराग पत्रिका के माध्यम से हुआ, मैंने जब पराग पढ़ना शुरू किया था तब मेरी उम्र मात्र १० साल थी और देवसरे साहब उस समय पराग के संपादक थे । पराग पत्रिका को देवसरे साहब ने एक नया रूप दिया और उस वक्त की नयी पीढ़ी को एक नयी दिशा दी।  डॉ श्री कृष्ण देवसरे जी सम्पादन के साथ साथ पराग के लिए रचनाये भी लिखते रहे और सम्पादकीय "मेरी बात सुनो" के माध्यम से बच्चो से सीधे संवाद स्थापित करते रहे। 

डॉ श्री प्रसाद जी भी बच्चो के लिए लिखे जाने वाले साहित्य में एक जाना  माना नाम हैं, पराग पत्रिका के  माध्यम से उनकी रचनाये हम तक लगातार पहुँचती रही। 


डॉ श्री हरी कृष्ण देवसरे 

                                         




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