Saturday, June 21, 2014

Amar Chitra Katha

अमर चित्रकथा 



अमर चित्रकथा की शरुआत 1967 में अनंत पई द्वारा की गयी।  अमर चित्रकथा भारत की पौराणिक एवं ऎतिहासिक कथाओंपर आधारित थीं , बाद में महापुरुषों , कवियों , वैज्ञानिकों की जीवनी और लोक गाथाओं  पर भी चित्रकथा लिखनी शुरू की गयी।  

अमर चित्र कथा के माध्यम से बच्चे अपने इतिहास और पुराण का  ज्ञान  प्राप्त करने के साथ साथ महान व्यक्तित्वों से  भी परिचित होते आये हैं।  
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अनंत पई 

१९२९ - २०११ 


  

  


  

  

   

Thursday, June 19, 2014

Indian Comic Strips



भारत में चित्रकथा 


चित्रकथाओं को बाल साहित्य का ही हिस्सा माना जाता रहा है क्योंकि चित्रों  के माध्यम से बच्चों को कहानी के पात्रों और वस्तुस्थिति के बारे में समझाना आसान हो जाता है। भारत में चित्रकथाओं की  शुरुआत विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कॉमिक स्ट्रिप  के रूप में हुई।  भारतीय चित्रकथाओ  से पहले विदेशी चित्रकथाओं के हिंदी अनुवाद ही उपलब्ध थे जो शायद भारतीय चित्रकथाओ के लिए प्रेरणास्रोत बने।

 





  

 


      

     

    



       
 
 























Saturday, June 7, 2014



मुंशी प्रेमचंद  का बाल साहित्य में योगदान

 

आज बाल साहित्य कुछ गिनी चुनी पत्रिकाओ तक ही  सिमट कर रह गया है, जो शायद नए लेखको और साहित्यकारो के बचकाने प्रयास भर ही है।  साहित्य जगत के मझे हुए खिलाड़ियों को बाल साहित्य लिखने में कोई रूचि  नहीं है क्योकि बाल साहित्य लेखको को प्रोत्साहित करने के लिए ना कोई बड़ा पुरस्कार ही दिया जाता है और न किसी प्रकार की गाढ़ी कमाई ही है।  आज नए लेखक या कवि जो  साहित्य जगत में अभी अभी आये हैं वो अपनी कलम की धार तेज करने के उददेश्य से बाल रचनाये लिख रहे हैं जिसकी वजह से बाल साहित्य का स्तर दिन पे दिन गिरता जा रहा है। उन रचनाओं में वो विषय नहीं होते जो बच्चों और किशोरों के मन तक पहुंच पाये , ये रचनाये मनोरंजन मात्र के लिए ही होती हैं। 
आज बच्चो में भी पढ़ने की रूचि कम  हुई है , पढने से मेरा तात्पर्य अपनी पाठयपुस्तक (TEXT BOOK) के अतिरिक्त पुस्तके पढ़ने से है।  आज के इस दौर में प्रत्येक माता पिता अपने बच्चो को भविष्य बनाने के लिए डॉक्टर और इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं , कुछ अपवादों को छोड़ कर साहित्य और कला के क्षेत्र में उनकी मजबूरी ही ले आती है।  क्योकि आज माँ बाप के साथ साथ बच्चे भी साहित्य पढ़ने को समय के बर्बादी ही मानते हैं।  आज के बच्चो किशोरों और युवाओं में नैतिक मूल्य नज़र नहीं आते क्योकि उन्हें साहित्य और कला को किनारे कर के पैसा कमाने की ओर प्रेरित किया गया है। अच्छे संस्कार , आदते और संस्कृति की समझ मनुष्य को बचपन  में ही सिखाये  जा सकते  है और इसका दायित्व माँ बाप और शिक्षको पर होता है।  माँ बाप का दायित्व ज्यादा है क्योकि माँ बाप ही अपनी संतान को दुनिया में लाते हैं तो वो बच्चा बड़ा हो कर समाज पर बोझ या समाज के प्रति  गैर जिम्मेवार ना हो जाए  इसका ध्यान माँ बाप को ही रखना चाहिए।  आज समाचारो में आये दिन ऐसी अप्रिय घटनाये सुनने को मिलती हैं जो आज के युवाओ में देश और समाज के प्रति गैर जिम्मेदाराना रवैया दर्शाती है और ये पिछले २५ सालो में साहित्य और कला के प्रति बच्चो किशोरों और युवाओ की उदासीनता का परिणाम है।  माँ बाप और शिक्षको ने बच्चो को नंबर पाने और पैसा कमाने पर बल दिया पर नैतिक मूल्य और संस्कारो को आत्मसात करना नहीं बता पाये।  बाल साहित्य जो बच्चो और किशोरों के चरित्र  निर्माण में सहायक हो सकता था उसे नयी पीढ़ी के माँ बाप और  शिक्षको के साथ साथ सरकार ने  भी दरकिनार किया।  

साहित्य कोई पढ़ना नहीं चाहता और ना ही लिखना चाहता है।  हाँ सही पढ़ा  आपने की कोई लिखना नहीं चाहता।  जो कुछ भी लिखा जाता है चाहे वो बड़ो के लिए लिखा जाता हो या बच्चो के लिए वो जबरदस्ती ही लिखा जाता है।  बड़ो के लिए लिखे जाने वाले साहित्य में कुंठित मन की अभिव्यक्ति ही होती है और जो अंतरंग सम्बन्धो और अश्लीलता को समेटे होती  है या लेखन ऐसी व्यक्तिगत समस्या पर  केंद्रित होता है जिससे किसी  और का सरोकार ही ना हो।  कुछ ऐसे भी साहित्यकार हैं जो बस पुरस्कार पाने के उद्देश्य से ही लिखते है।  

बाल साहित्य लिखने के लिए दुनिया को बच्चो और  किशोरों की नज़र से देखने की  आवश्यकता होती है।  बड़ा बन कर बच्चो के लिए नहीं लिखा जा सकता।   रुसी साहित्य कार  लियो तोलस्तोय  ने जितना और जैसा बच्चो  के लिए लिखा है   उसी से मेल खाता साहित्य भारत में प्रेमचंद ने लिखा। 

प्रेमचंद ने बच्चो के लिए जो कुछ लिखा है उसका अनुसरण  ही आज के साहित्य कार करते आ रहे हैं।  प्रेमचंद की लिखी हुई प्रसिद्ध बाल कहानियो में ईदगाह , दो बैलो की कथा ,  सच्चाई का उपहार, बड़े भाई साहब , गुल्ली - डंडा, कजाकी इत्यादि को गिना  जा सकता है। 



Monday, June 2, 2014

 प्रख्यात बाल साहित्य कार श्री हरी कृष्ण देवसरे और श्रीप्रसाद जी का निधन बाल साहित्य जगत के लिए बहुत बड़ी क्षति है।  डॉ. देवसरे का एक लम्बी बीमारी का बाद १४ नवंबर २०१३ को निधन हो गया,  बाल साहित्य जगत के स्तम्भ का बाल दिवस के दिन ही अंत हो जाना अपने आप में एक विडम्बना है।  ऐसे शख्स का जिसने अपना जीवन बाल साहित्य जगत को अपने निरंतर प्रयासों से सवारने में लगा दिया और बच्चो के लिया लेखन को  समर्पित रहा  उनका बाल दिवस के दिन ही हमेशा के लिए चले जाना प्रकृति के द्वारा किया गया चुटीला व्यंग  ही है।  

श्री हरी कृष्ण देवसरे जी से मेरा परिचय पराग पत्रिका के माध्यम से हुआ, मैंने जब पराग पढ़ना शुरू किया था तब मेरी उम्र मात्र १० साल थी और देवसरे साहब उस समय पराग के संपादक थे । पराग पत्रिका को देवसरे साहब ने एक नया रूप दिया और उस वक्त की नयी पीढ़ी को एक नयी दिशा दी।  डॉ श्री कृष्ण देवसरे जी सम्पादन के साथ साथ पराग के लिए रचनाये भी लिखते रहे और सम्पादकीय "मेरी बात सुनो" के माध्यम से बच्चो से सीधे संवाद स्थापित करते रहे। 

डॉ श्री प्रसाद जी भी बच्चो के लिए लिखे जाने वाले साहित्य में एक जाना  माना नाम हैं, पराग पत्रिका के  माध्यम से उनकी रचनाये हम तक लगातार पहुँचती रही। 


डॉ श्री हरी कृष्ण देवसरे 

                                         




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